CBSE Class 10 Hindi (Course A) • Kritika Part-2 • Prose (Gadya)
पाठ का सारांश (Summary/Context):
'मैं क्यों लिखता हूँ' (Why do I write?) अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) द्वारा रचित एक मनोवैज्ञानिक (Psychological) और वैचारिक निबंध है। इसमें लेखक ने सृजन-प्रक्रिया (Creative process) और उस गहरी प्रेरणा (Inspiration) पर प्रकाश डाला है जो किसी भी रचनाकार (Writer) को लिखने पर मजबूर करती है। लेखक के अनुसार इंसान केवल किसी बाहरी दबाव (जैसे धन, शोहरत, या प्रकाशक/एडिटर का आदेश) के कारण सच्चा साहित्य नहीं रच सकता। एक सच्ची रचना तब सामने आती है जब लेखक के भीतर कोई अनुभव छटपटाने (Inner Restlessness) लगता है, और उसे बाहर निकालकर (लिखकर) ही उसे शांति मिलती है। पाठ में लेखक ने जापान के हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम (Atom Bomb) के दर्द को कविता ('हिरोशिमा') के माध्यम से व्यक्त करने का उदाहरण दिया है।
लेखक 'लिखने' के दो मुख्य कारण या दबाव मानते हैं:
लेखक ने इन दोनों के बीच एक स्पष्ट और महत्वपूर्ण अंतर बताया है। केवल आँखों से देख लेना (प्रत्यक्ष अनुभव) रचना के लिए काफी नहीं है:
प्रश्न 1: 'मैं क्यों लिखता हूँ' पाठ के आधार पर बताइए कि किसी भी लेखक को रचना (Writing) करने के लिए कौन-कौन से तत्व या कारण 'प्रेरित' (Inspire) करते हैं?
उत्तर: अज्ञेय जी के अनुसार, किसी भी लेखक को लिखने पर मजबूर करने वाले दो
मुख्य कारण (दबाव) होते हैं:
1. बाहरी दबाव (External Pressure): जैसे कि धन (पैसे) की आवश्यकता होना, प्रसिद्धि
(शोहरत) प्राप्त करने की इच्छा, या किसी प्रकाशक/संपादक का बार-बार आग्रह (Demand) करना। इससे लेखक कुछ
'यंत्रवत' तो लिख सकता है, पर वह रचना महान नहीं होती।
2. आंतरिक विवशता और छटपटाहट (Internal Restlessness - The Real Reason): एक सच्चा और
महान कलाकार तब तक नहीं लिखता जब तक उसके अंदर उपजी कोई गहरी 'अनुभूति', दर्द या अनुभव उसे भीतर ही भीतर
'बेचैन और तड़पाने' न लगे। अपनी इस आंतरिक छटपटाहट और घुटन से स्वयं को मुक्त (Free) करने के लिए ही वह
लिखता है। यही सबसे मजबूत प्रेरणा है।
प्रश्न 2: लेखक के अनुसार 'प्रत्यक्ष अनुभव' (Direct Experience) और 'अनुभूति' (Deep Realization) में क्या अंतर है?
उत्तर: लेखक के अनुसार, 'प्रत्यक्ष अनुभव' वह होता है जो घटना हमारे सामने घटित होती है और जिसे हम केवल अपनी 'आँखों' से देखते या कानों से सुनते हैं; यह केवल बाहरी जानकारी है। इसके विपरीत 'अनुभूति' वह अवस्था है जब हम संवेदना और कल्पना के सहारे किसी घटना या किसी दूसरे की पीड़ा (दर्द) को अपनी आत्मा और 'भीतर' तक महसूस (Feel) कर लेते हैं (अर्थात् दूसरे का दर्द हमारा अपना दर्द बन जाता है)। लेखक का मानना है कि केवल 'अनुभव' से सच्चा साहित्य नहीं लिखा जा सकता; एक सच्ची और मार्मिक रचना केवल 'अनुभूति' से ही जन्म लेती है।
प्रश्न 3: हिरोशिमा की घटना विज्ञान का भयानकतम दुरुपयोग है? आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर: मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। विज्ञान (Science) का जन्म प्राकृतिक रहस्यों को सुलझाने और मानवता (Humanity) के जीवन को बेहतर, सुखी और आरामदायक बनाने के लिए हुआ था। परंतु हिरोशिमा (जापान) पर 'परमाणु बम' गिराकर विज्ञान की शक्ति का उपयोग केवल क्रूरता, अमानवीयता और महा-विनाश के लिए किया गया। लाखों निर्दोष लोग एक पल में राख बन गए और अगली कई पीढ़ियाँ 'रेडिएशन' के कारण अपाहिज और बीमार पैदा हुईं। यह विज्ञान के सदुपयोग का नहीं बल्कि, इंसान के अहंकार और क्रूरतम शक्ति-प्रदर्शन का सबूत है। अतः यह विज्ञान का भयंकरतम दुरुपयोग ही है।
प्रश्न 4: लेखक ने 'हिरोशिमा' पर कविता कब और कहाँ लिखी? और क्यों लिखी?
उत्तर: लेखक अज्ञेय जब जापान गए, तो उन्होंने हिरोशिमा में रेडियोऐक्टिविटी (परमाणु बम) से पीड़ित लोगों के दर्द को 'देखा', पर वे उस पर एकदम 'लिख' नहीं पाए। एक दिन हिरोशिमा की एक सड़क पर घूमते हुए उन्होंने एक बहुत 'बड़ा जला हुआ पत्थर' देखा, जिस पर किसी 'इंसान की भाप' (छाया) छपी हुई थी (क्योंकि बम की भयानक गर्मी में इंसान जलकर भाप बन गया होगा और पत्थर झुलस गया)। इस दृश्य को देखकर लेखक को 'अनुभूति' का झटका लगा और वे उस दर्दनाक विस्फोट के 'काल्पनिक गवाह' (Witness) बन गए। उस आंतरिक पीड़ा (तड़प) और छटपटाहट से मुक्ति पाने के लिए ही उन्होंने जापान से 'भारत लौटते समय ट्रेन में बैठकर' अपनी कविता 'हिरोशिमा' लिखी।