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सूरदास के पद

CBSE Class 10 Hindi (Course A) • Kshitij Part-2 • Poetry (Kavya)

पदों का सारांश (Summary/Context):

सूरदास के ये चार पद उनके महाकाव्य 'सूरसागर' के 'भ्रमरगीत' (Bhramargeet) प्रसंग से लिए गए हैं। जब श्रीकृष्ण मथुरा चले गए और स्वयं न लौटकर अपने मित्र उद्धव (Uddhav) के माध्यम से गोपियों के लिए 'निर्गुण ब्रह्म' और 'योग' (Yoga) का संदेश भेजा, तब गोपियों की विरह-अग्नि (Pain of separation) और भड़क उठी। उन्होंने उद्धव के ज्ञान-मार्ग को ख़ारिज कर दिया और अपने सगुण प्रेम-मार्ग (भक्ति) की श्रेष्ठता सिद्ध की। इसी बीच वहाँ एक 'भौंरा' (Bhramara/Bee) आ गया, जिसे प्रतीक (Symbol) बनाकर गोपियों ने उद्धव पर करारे व्यंग्य (Taunts) किए। इन पदों में गोपियों के निश्छल प्रेम, वाक्चातुर्य (Telling ability/Wit), और श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति (Devotion) का अद्भुत चित्रण है।

1. कवि का परिचय (Poet Introduction)

कवि: सूरदास (Surdas)

सूरदास हिंदी साहित्य (भक्तिकाल) के सगुण मार्गी श्रीकृष्ण-भक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनका जन्म 1478 ई. में माना जाता है। वे 'अष्टछाप' के कवियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। उनके गुरु महाप्रभु वल्लभाचार्य थे। सूरदास जी जन्मांध (Blind from birth) माने जाते हैं, फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं और गोपी-प्रेम का ऐसा सूक्ष्म और सजीव वर्णन किया है कि उन्हें वात्सल्य (Motherly love) और शृंगार रस का सम्राट कहा जाता है। 'सूरसागर', 'सूरसारावली' और 'साहित्य लहरी' उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। इनकी भाषा शुद्ध 'ब्रजभाषा' है।

2. पदों की व्याख्या और मुख्य भाव (Explanation of Stanzas)

पद 1: "ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी..." (गोपियों का उद्धव पर व्यंग्य)

पद 2: "मन की मन ही माँझ रही..." (गोपियों की विरह-व्यथा और निराशा)

पद 3: "हमारैं हरि हारिल की लकरी..." (कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम का दावा)

पद 4: "हरि हैं राजनीति पढ़ि आए..." (कृष्ण पर राजनीतिज्ञ होने का आरोप)

3. महत्वपूर्ण कथन एवं उनके अर्थ (Important Quotes)

"सूरदास अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यों पागी।"

= अर्थ: गोपियाँ कहती हैं कि हम तो भोली और कमज़ोर महिलाएँ (अबला) हैं। जिस प्रकार चींटियाँ गुड़ (Jaggery) के प्रति आकर्षित होकर उससे चिपक जाती हैं और वहीं अपने प्राण दे देती हैं, लेकिन गुड़ को नहीं छोड़तीं; उसी प्रकार हम भी श्रीकृष्ण के प्रेम में पूरी तरह डूब चुकी हैं। यह गोपियों के अटूट और सच्चे प्रेम (True Devotion) का प्रमाण है।

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: गोपियों द्वारा उद्धव को 'बड़भागी' (भाग्यशाली) कहने में क्या व्यंग्य निहित है?

उत्तर: 'बड़भागी' कहकर गोपियों ने उद्धव पर तीखा व्यंग्य किया है। वास्तव में वे उन्हें सबसे 'अभागा' (दुर्भाग्यशाली) बता रही हैं। व्यंग्य यह है कि उद्धव प्रेम के सागर (श्रीकृष्ण) के समीप रहते हुए भी उनके प्रेम के बंधन में नहीं बंध पाए, न ही उनके मन में कृष्ण के प्रति अनुराग (प्रेम) उत्पन्न हुआ। जो इंसान कृष्ण के सान्निध्य में रहकर भी प्रेम की गहराई को न समझ सके, वह भाग्यशाली नहीं, बल्कि दुर्भाग्यशाली और भावना-रहित (Emotionless) है।


प्रश्न 2: उद्धव के 'योग-संदेश' ने गोपियों की विरहाग्नि में 'घी' का काम कैसे किया?

उत्तर: गोपियाँ श्रीकृष्ण के मथुरा जाने के बाद उनके लौट आने की आशा में विरह (अलगाव) की पीड़ा को चुपचाप सह रही थीं। उन्हें विश्वास था कि कृष्ण आएँगे और उनकी पीड़ा शांत होगी। परंतु, जब कृष्ण स्वयं नहीं आए और उन्होंने अपने मित्र उद्धव के हाथों योग-साधना (ईश्वर का निराकार ध्यान करने) का नीरस संदेश भेज दिया, तो गोपियों की सारी उम्मीदें टूट गईं। उनकी जो अग्नि (पीड़ा) शांत होने की राह देख रही थी, वह योग और ज्ञान का संदेश सुनकर और धधक उठी, मानो आग में घी डाल दिया गया हो।


प्रश्न 3: "मरजादा न लही" (मर्यादा नहीं रखी)—के माध्यम से गोपियाँ कौन-सी मर्यादा न रहने की बात कर रही हैं?

उत्तर: गोपियाँ यहाँ 'प्रेम की मर्यादा' की बात कर रही हैं। प्रेम की मर्यादा यह होती है कि प्रेमी, प्रेमिका के प्रेम को समझे और प्रेम के बदले उसे प्रेम ही दे। गोपियों ने श्रीकृष्ण से निश्छल प्रेम किया था, अतः वे भी कृष्ण से वैसा ही प्रतिदान (Return) चाहती थीं। परंतु श्रीकृष्ण ने अपना प्रेम निभाने (वापस लौटकर आने) की जगह, उद्धव के माध्यम से 'योग-संदेश' भिजवा दिया और प्रेम का रिश्ता तोड़ने को कहा। इसी कारण गोपियाँ कहती हैं कि जब कृष्ण ने ही प्रेम की मर्यादा नहीं रखी, तो अब हम कैसे धैर्य धारण करें।


प्रश्न 4: गोपियों ने उद्धव के योग-संदेश की तुलना किससे की है और क्यों?

उत्तर: गोपियों ने उद्धव के योग-संदेश की तुलना "कड़वी ककड़ी" (Bitter cucumber) और एक "व्याधि" (ऐसी बीमारी जो कभी न देखी न सुनी) से की है। इसका कारण यह है कि गोपियाँ कृष्ण के सगुण प्रेम 'मिठास' में डूबी हुई थीं। उनके लिए निराकार ईश्वर (निर्गुण ब्रह्म) और कठिन योग-साधना की बातें बिलकुल स्वादहीन, नीरस और गले से नीचे न उतरने वाली (कड़वी) थीं। वे योग को ऐसी मानसिक बीमारी मानती हैं जिसे अपनाना उनके लिए असंभव है, और सलाह देती हैं कि यह संदेश उन लोगों को दो जिनका मन 'चकरी के समान' स्थिर नहीं है।