उत्तर
कवि (नागार्जुन) के मन पर एक छोटे से बच्चे की दंतुरित मुसकान (नए-नए निकले दाँतों वाली मुसकान) का अद्भुत प्रभाव पड़ता है। उसे लगता है कि इस मुसकान को देखकर मरे हुए व्यक्ति (कठोर और निराश व्यक्ति) के अंदर भी जान (प्राण) आ जाएगी। बच्चे का धूल से सना शरीर देखकर कवि को लगता है मानो उसके झोपड़े में कमल का फूल खिल गया हो। इस निर्मल और पवित्र मुसकान से पत्थर जैसा कठोर हृदय भी पिघलकर जल (करुणा) बन जाता है।
उत्तर
1. बच्चे की मुसकान: यह मुसकान पूरी तरह से निःस्वार्थ, भोली, और निष्कपट (pure) होती है। इसमें कोई बनावट या उद्देश्य नहीं होता। यह स्वाभाविक रूप से निकलती है और हर किसी का मन मोह लेती है。
2. बड़े व्यक्ति की मुसकान: प्रायः बड़ों की मुसकान में औपचारिकता (Formality), बनावट या कोई स्वार्थ छिपा होता है। वह परिस्थितियों के अनुसार सोच-समझकर हँसते हैं। उनकी मुसकान वैसी निर्मल नहीं होती जैसी बच्चे की होती है।
उत्तर
कवि नागार्जुन के अनुसार फसल का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्त्व नहीं है। फसल प्रकृति और मनुष्य दोनों के मिले-जुले सहयोग (सहकार) का परिणाम है। कवि कहता है कि फसल नदियों के पानी का जादू, लाखों-करोड़ों किसानों के हाथों की मेहनत का स्वरूप, भूरी-काली मिट्टी का गुणधर्म (पोषक तत्व), सूरज की किरणों का प्रभाव और हवाओं की गति का सिमटा हुआ रूप है। इन सभी के बिना फसल पैदा नहीं हो सकती।
उत्तर
इस पंक्ति के माध्यम से कवि किसानों और मज़दूरों के कठोर परिश्रम (मेहनत) को सम्मान देना चाहता है। कवि का मानना है कि केवल मिट्टी, पानी और धूप से फसल नहीं उगती, उसे उगाने के लिए किसान दिन-रात मेहनत करते हैं। किसान के "हाथों के स्पर्श" से ही बीज एक लहलहाती फसल में बदलता है। इसलिए, फसल किसान की मेहनत की गरिमा (गौरव) और महिमा का ही साक्षात रूप है।