CBSE Class 10 Hindi (Course B) • Sparsh Part-2 • Prose (Gadya)
पाठ का सारांश (Summary/Context):
'तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र' (The Architect of Teesri Kasam: Shailendra) प्रह्लाद अग्रवाल द्वारा लिखा गया एक व्यक्ति-चित्र (Biographical sketch) और समीक्षात्मक निबंध है। यह पाठ हिंदी सिनेमा के महान गीतकार (Lyricist) शैलेंद्र के जीवन, उनके आदर्शों, और उनके द्वारा प्रोड्यूस (Produce) की गई एकमात्र फिल्म 'तीसरी कसम' (Teesri Kasam - 1966) के इर्द-गिर्द घूमता है। शैलेंद्र ने इस फिल्म का निर्माण 'व्यापार' (Business/Profit) के लिए नहीं, बल्कि अपनी 'आत्मा की संतुष्टि' और कला (Art) के प्रति पूर्ण समर्पण के लिए किया था। फिल्म ने मील का पत्थर (Milestone) तो स्थापित किया और कई पुरस्कार जीते, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर इसे वह व्यावसायिक सफलता (Commercial success) नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी। पाठ में शैलेंद्र के सीधेपन, राज कपूर की सच्ची मित्रता और फिल्म-जगत के 'भौतिकवादी' (Materialistic) रवैये का पर्दाफाश किया गया है।
पुरस्कार तो मिले पर पैसा नहीं:
जब फिल्म 'तीसरी कसम' (1966) रिलीज़ हुई, तो समीक्षकों (Critics) और साहित्यकारों ने इसकी ज़बरदस्त तारीफ की। इसे राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक (President's Gold Medal) मिला, मास्को फिल्म फेस्टिवल (Moscow Film Festival) में पुरस्कार मिला, और यह फिल्म 'भारतीय सिनेमा का एक मील का पत्थर' (Milestone of Indian Cinema) बन गई। इस फिल्म को कई लोगों ने सेल्युलाईड पर लिखी गई 'कविता' (A poem on celluloid) कहा।
व्यावसायिक विफलता: लेकिन बॉक्स ऑफिस (Box Office) पर इसे दर्शकों का समर्थन नहीं मिला। फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर्स ने इसे सही ढंग से प्रमोट (Promote) या रिलीज़ ही नहीं किया क्योंकि उन्हें लगा कि इसमें चमक-दमक, मसाला (Masala element) या हैप्पी एंडिंग नहीं है। फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हो गई। शैलेंद्र पर 'कर्ज़' (Debt) चढ़ गया। फिल्म की असफलता और अपने करीबी लोगों (इंडस्ट्री के लोगों) के धोखे से वे इतने दुखी (Depressed) हो गए कि इस फिल्म के रिलीज़ होने के कुछ ही महीनों बाद, 43 वर्ष की कम उम्र में उनका निधन (Death) हो गया।
= अर्थ: यह कथन बताता है कि 'तीसरी कसम' में एक साधारण फिल्म की तरह शोर-शराबा, मार-धाड़ या नकली प्रेम नहीं था। यह फिल्म 'भावनाओं', 'साहित्यिक गहराई' और 'ग्रामीण वास्तविकता' से इतनी परिपूर्ण थी कि इसके दृश्य (Scenes) और इसके गीत बिल्कुल एक सुंदर और शांत 'कविता' (Poem) की तरह महसूस होते थे। इसमें कला और जीवन का एक बहुत ही पवित्र मिलन था।
= अर्थ: आमतौर पर फिल्म निर्माता अपनी फिल्मों में पैसा कमाने के लिए 'मसाला' (आइटम डांस, कॉमेडी, सुखद अंत) डालते हैं, भले ही कहानी की आत्मा मर जाए। लेकिन शैलेंद्र ने 'तीसरी कसम' में ऐसा कोई समझौता (Compromise) नहीं किया। फणीश्वरनाथ रेणु की मूल कहानी जैसी थी (जिसका अंत दुःखद था, जहाँ हीरामन और हीराबाई अलग हो जाते हैं), शैलेंद्र ने उसे बिल्कुल वैसा ही पर्दे पर उतारा। उन्होंने 'कच्चे माल' या 'मुनाफ़े' (Profit) से ज़्यादा सम्मान 'सच्ची कला' को दिया।
प्रश्न 1: 'तीसरी कसम' फिल्म को 'सेल्युलाईड पर लिखी कविता' क्यों कहा गया है?
उत्तर: 'सेल्युलाईड पर लिखी कविता' का अर्थ है कि फिल्म का एक-एक दृश्य (सीन) और उसमें बजने वाला संगीत अत्यंत भावपूर्ण और काव्यात्मक (Poetic) था। आमतौर पर फिल्मों में सस्ते मनोरंजन (मार-धाड़, नकली रोमांस) का इस्तेमाल होता है, लेकिन 'तीसरी कसम' में फणीश्वरनाथ रेणु की साहित्यिक कहानी की मूल आत्मा और लोक-संस्कृति (ग्रामीण जीवन) को बिल्कुल शुद्ध व यथार्थ (Realistic) रूप में पर्दे पर उतारा गया था। इसमें इंसान के सुख-दुख, प्रेम की गहराई और संवेदना को इतनी खूबसूरती से पिरोया गया था कि वह फिल्म न लगकर एक साक्षात 'कविता' प्रतीत होती थी।
प्रश्न 2: राज कपूर ने 'तीसरी कसम' में काम करने के लिए शैलेंद्र से पारिश्रमिक (Fees) के रूप में क्या माँगा था? इससे उनकी मित्रता के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर: जब शैलेंद्र ने राज कपूर से इस फिल्म में नायक (हीरो-हीरामन) की
भूमिका निभाने का प्रस्ताव रखा, तो राज कपूर ने अपना 'कपूर-सुलभ लहज़ा' (अंदाज़) अपनाते हुए कहा—“निकालो मेरा
एडवांस (Advance), केवल एक रुपया।”
यह घटना इस बात का प्रमाण (Proof) है कि राज कपूर और शैलेंद्र के बीच केवल एक 'व्यवसायिक (Professional)
रिश्ता' नहीं था, बल्कि वे दोनों 'सच्चे और गहरे मित्र' (True Friends) थे। राज कपूर जानते थे कि शैलेंद्र
एक उच्च-कोटि के कवि हैं जो पैसों के लिए नहीं बल्कि कला के लिए फिल्म बना रहे हैं, इसलिए उन्होंने बिना
पैसों की परवाह किए उनकी 'पहली' फिल्म में मुफ़्त (Free) काम किया।
प्रश्न 3: शैलेंद्र को 'तीसरी कसम' फिल्म के निर्माण से क्या नुकसान हुआ? इसके क्या कारण थे?
उत्तर: 'तीसरी कसम' फिल्म के निर्माण के दौरान शैलेंद्र को न केवल बहुत
बड़ा 'आर्थिक नुकसान' (Financial Loss) हुआ, बल्कि उन्हें भारी 'मानसिक
आघात' (Mental shock/depression) भी पहुँचा।
कारण: शैलेंद्र एक सीधे-सादे, भावुक और आदर्शवादी कवि थे, वे कोई चतुर 'व्यापारी'
(Businessman) नहीं थे। उन्होंने फिल्म को 'कला की दृष्टि' से बनाया था, जिसमें कहानी का दुःखद (Tragic) अंत
था। फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर्स (Distributors) को लगा कि इस फिल्म में कोई कमर्शियल (Commercial) चमक या मसाला
नहीं है, और इसका अंत दर्शकों को रुलाएगा, इसलिए उन्होंने इसे खरीदने और प्रमोट करने से मना कर दिया। जिन
लोगों को शैलेंद्र अपना मित्र समझते थे (इंडस्ट्री के लोग), उन्होंने भी उनका साथ छोड़ दिया। फिल्म फ्लॉप हुई
और शैलेंद्र कर्ज़ (Debt) में डूब गए, इसी दुख के कारण उनकी मृत्यु भी हो गई।