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अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले

CBSE Class 10 Hindi (Course B) • Sparsh Part-2 • Prose (Gadya)

पाठ का सारांश (Summary/Context):

'अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले' निदा फ़ाज़ली द्वारा लिखा गया एक अत्यंत संवेदनशील और विचारणीय (Thought-provoking) पाठ है। इस पाठ में लेखक ने मुख्य रूप से 'पर्यावरण विनाश' (Environmental Destruction) और 'मानवीय संवेदनाओं के पतन' (Decline of Human Sensitivity) पर चिंता व्यक्त की है। लेखक याद करते हैं कि पहले के समय में इंसान पशु-पक्षियों, जानवरों और यहाँ तक कि कीड़े-मकोड़ों के दर्द को भी अपना दर्द समझते थे (जैसे सुलेमान, शेख अयाज़ के पिता, और लेखक की माँ)। परंतु आज का इंसान 'स्वार्थी' (Selfish) हो गया है। उसने अपनी सुख-सुविधाओं (सभ्यता/शहरीकरण) के लिए पेड़ों, जंगलों और समुद्रों को नष्ट कर दिया है, पशु-पक्षियों को बेघर कर दिया है और अब वह अपनी बिल्डरों की 'बस्तियों' में कैद होकर क्रूर (Cruel) बन गया है। आज कोई भी दूसरों के (यहाँ तक कि अपने पड़ोसियों के) दुःख से दुखी नहीं होता।

1. लेखक का परिचय (Author Introduction)

लेखक: निदा फ़ाज़ली (Nida Fazli)

निदा फ़ाज़ली (1938-2016) एक प्रसिद्ध हिंदी-उर्दू कवि (Poet) और गीतकार थे। उनका जन्म दिल्ली में हुआ था, लेकिन आज़ादी के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया, जबकि वे भारत में ही रुक गए। उनकी रचनाओं में सांप्रदायिक सद्भाव (Communal Harmony), इंसानियत और प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम झलकता है। उन्होंने हिंदी और उर्दू को मिलाकर एक बहुत ही सरल और दिल को छू लेने वाली भाषा का प्रयोग किया है। उनके प्रसिद्ध कविता संग्रह 'लफ़्ज़ों का पुल' और 'खोया हुआ सा कुछ' हैं।

2. प्राचीन काल की संवेदनशीलता के उदाहरण (Examples from Past/History)

पाठ में लेखक ने तीन महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर सिद्ध किया है कि पहले के इंसान 'जीव-जंतुओं' को लेकर कितने दयालु (Compassionate) थे:

  1. पैगंबर सुलेमान (Prophet Suleiman):
    सुलेमान ईसा से 1025 वर्ष पूर्व एक बादशाह थे। कहा जाता है कि वे केवल इंसानों के नहीं, बल्कि 'पशु-पक्षियों के भी बादशाह' थे और उनकी भाषा समझते थे। एक बार वे अपनी सेना (Army) के साथ रास्ते से गुज़र रहे थे। घोड़ों की टापों (आवाज़) को सुनकर कुछ चींटियाँ (Ants) डर कर अपनी बिलों की तरफ भागने लगीं। सुलेमान ने उनकी घबराहट को समझा और रुक कर कहा- "घबराओ मत, सुलेमान किसी के लिए मुसीबत नहीं, वह खुदा का बंदा और सब का रखवाला (Protector) है।"
  2. शेख अयाज़ के पिता (Sheikh Ayaz's Father):
    शेख अयाज़ एक प्रसिद्ध सिंधी कवि (Sindhi Poet) थे। उनके पिता एक दिन कुएँ से नहाकर लौट रहे थे कि तभी उनकी भोजन की थाली परोस दी गई। जैसे ही उन्होंने रोटी का टुकड़ा तोड़ा, उनकी नज़र अपनी 'बाजू' (Arm) पर रेंगते हुए एक काले 'च्योंटे' (Black Ant) पर पड़ी। उन्होंने तुरंत खाना छोड़ दिया और उठ खड़े हुए। पत्नी के पूछने पर कहा- "परेशान नहीं हूँ, मैंने एक 'घरवाले' (जीव) को बेघर कर दिया है, मैं पहले उसे उसके घर (कुएँ) छोड़ने जा रहा हूँ।"
  3. लेखक की माँ (Author's Mother):
    लेखक की माँ प्रकृति और जानवरों से बहुत प्यार करती थीं। उन्होंने लेखक को बचपन में कुछ नियम सिखाए थे:
    - शाम को पेड़ के पत्ते मत तोड़ो, पेड़ रोएँगे। (Don't pluck leaves in the evening)
    - दीया-बत्ती के वक़्त (रात में) फूल मत तोड़ो, फूल बद्दुआ (Curse) देंगे।
    - दरिया (नदी/River) को सलाम करो, कबूतरों को दाना डालो और मुर्गों को मत सताओ।
    एक बार ग्वालियर में उनके घर के रोशनदान (Ventilator) में कबूतर का घोंसला था। बिल्ली ने एक अंडा तोड़ दिया। उसे बचाने की कोशिश में माँ के हाथ से भी दूसरा अंडा गिरकर टूट गया। इस 'पाप' को महसूस करके माँ इतनी दुखी हुईं कि वह दिनभर रोती रहीं और 'प्रायश्चित' (Penance) के लिए उन्होंने पूरा 'रोज़ा' (Fast) रखा।

3. वर्तमान काल का स्वार्थ और पर्यावरण विनाश (Modern Reality & Destruction)

4. महत्वपूर्ण कथन एवं उनके अर्थ (Important Quotes)

"अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले..."

= अर्थ: यह इस पाठ का शीर्षक और 'केंद्रीय भाव' (Central Theme) है। लेखक अत्यंत दुःख के साथ कहता है कि इंसान इतना अधिक 'भौतिकवादी' (Materialistic) और अपने तक सीमित (Self-centered) हो गया है कि अब उसके दिल से 'हमदर्दी' (Sympathy) पूरी तरह खत्म हो गई है। जब लोग अपने सगे-संबंधियों और पड़ोसियों की पीड़ा को नहीं समझते, तो वे मूक (गूँगे) पशु-पक्षियों के दर्द को भला क्या समझेंगे? आज का इंसान सिर्फ 'अपने सुख' से खुश होता है और दूसरे के दुःख पर आँखें मूँद लेता है।

"नेचर की सहनशक्ति की भी एक सीमा होती है..."

= अर्थ: प्रकृति (Nature/Environment) बहुत विशाल और सहनशील है, लेकिन जब मनुष्य 'विकास' (Development) के नाम पर जंगलों को काटता है, नदियों को रोकता है और पहाड़ों को तोड़ता है, तो एक दिन 'प्रकृति का गुस्सा' (Nature's Wrath) फूट पड़ता है। भूकंप (Earthquakes), बाढ़ (Floods), भयंकर तूफान (Cyclones) और बीमारियाँ (जैसे बे-मौसम बारिश) इसी बात का परिणाम हैं कि इंसान ने प्रकृति की 'सहनशक्ति के बाँध' को तोड़ दिया है।

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: 'अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले' पाठ के आधार पर बताइए कि आज की मानवीय (Human) सभ्यता और पुरानी सभ्यता में सबसे बड़ा 'अंतर' क्या है?

उत्तर: सबसे बड़ा अंतर इंसानी 'संवेदनशीलता' (Sensitivity) और 'स्वार्थ' (Selfishness) का है।
1. पुरानी सभ्यता: प्राचीन काल में मनुष्य यह मानता था कि धरती केवल हमारी नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और जानवरों की भी है। लोग (जैसे सुलेमान और शेख अयाज़) चींटियों तक के दर्द को अपना दर्द समझते थे।
2. आज की सभ्यता: आज मनुष्य अत्यंत घमंडी हो गया है। उसने पर्यावरण का नाश कर दिया है। पुरानी 'सयुंक्त (Joint) परिवारों' की जगह 'कबूतर के दड़बे' (Flat/Apartment) ने ले ली है। आज लोग जानवरों को तो छोड़िए, अपने पड़ोसियों और बेसहारा इंसानों के दुःख को देखकर भी 'दुखी' नहीं होते।


प्रश्न 2: लेखक की माँ और लेखक की पत्नी में कबूतरों के प्रति क्या 'अंतर' (Difference) स्पष्ट होता है?

उत्तर:
लेखक की माँ: वे अत्यंत संवेदनशील (Sensitive) और दयालु (Compassionate) थीं। जब उनसे अनजाने में कबूतर का एक अंडा टूट गया था, तो उन्होंने इस बात का गहरा शौक (दुःख/Guilt) मनाया और 'प्रायश्चित' (Penance) स्वरूप पूरे दिन कुछ नहीं खाया (रोज़ा रखा) और भगवान से माफ़ी माँगी।
लेखक की पत्नी: वे आधुनिक और 'व्यावहारिक' (Practical/Selfish) हैं। घर में कबूतर 'गंदगी' फैलाते हैं और चीज़ें तोड़ते हैं, यह देखकर उन्होंने कबूतरों से 'हमदर्दी' जताने के बजाय, रोशनदान पर 'जाली' (Net) लगवा दी और उन्हें हमेशा के लिए बेघर (Homeless) कर दिया। यह अंतर बताता है कि आज इंसान अपनी सुविधा के लिए कितना নিষ্ঠুর (Cruel) हो गया है।


प्रश्न 3: प्रकृति (Nature) में आए 'असंतुलन' (Imbalance) का क्या परिणाम हुआ है? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: मनुष्य ने अपनी सुख-सुविधाओं (कंक्रीट के जंगल और बिल्डरों की बस्तियों) के लिए प्रकृति के साथ भयानक खिलवाड़ (असंतुलन) किया है:
1. पर्यावरण का विनाश: जंगल कट गए, जिससे जानवर बेघर हो गए और बेचारे कबूतरों को इंसानों के 'रोशनदान' में घर बनाना पड़ा।
2. प्रकोप (Disasters): जब प्रकृति की 'सहनशक्ति' की सीमा पार हो गई, तो भयंकर 'भूकंप' (Earthquakes), 'बाढ़' (Floods), और बे-मौसम तूफान (Cyclones) आने लगे। बंबई (मुंबई) के समुद्र ने क्रोधित होकर तीन बड़े जहाज़ों को उड़ा कर फेंक दिया था, जो इस बात का सबूत है कि प्रकृति के गुस्से से इंसान बच नहीं सकता।