CBSE Class 10 Hindi (Course B) • Sparsh Part-2 • Prose (Gadya)
पाठ का सारांश (Summary/Context):
'अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले' निदा फ़ाज़ली द्वारा लिखा गया एक अत्यंत संवेदनशील और विचारणीय (Thought-provoking) पाठ है। इस पाठ में लेखक ने मुख्य रूप से 'पर्यावरण विनाश' (Environmental Destruction) और 'मानवीय संवेदनाओं के पतन' (Decline of Human Sensitivity) पर चिंता व्यक्त की है। लेखक याद करते हैं कि पहले के समय में इंसान पशु-पक्षियों, जानवरों और यहाँ तक कि कीड़े-मकोड़ों के दर्द को भी अपना दर्द समझते थे (जैसे सुलेमान, शेख अयाज़ के पिता, और लेखक की माँ)। परंतु आज का इंसान 'स्वार्थी' (Selfish) हो गया है। उसने अपनी सुख-सुविधाओं (सभ्यता/शहरीकरण) के लिए पेड़ों, जंगलों और समुद्रों को नष्ट कर दिया है, पशु-पक्षियों को बेघर कर दिया है और अब वह अपनी बिल्डरों की 'बस्तियों' में कैद होकर क्रूर (Cruel) बन गया है। आज कोई भी दूसरों के (यहाँ तक कि अपने पड़ोसियों के) दुःख से दुखी नहीं होता।
पाठ में लेखक ने तीन महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर सिद्ध किया है कि पहले के इंसान 'जीव-जंतुओं' को लेकर कितने दयालु (Compassionate) थे:
= अर्थ: यह इस पाठ का शीर्षक और 'केंद्रीय भाव' (Central Theme) है। लेखक अत्यंत दुःख के साथ कहता है कि इंसान इतना अधिक 'भौतिकवादी' (Materialistic) और अपने तक सीमित (Self-centered) हो गया है कि अब उसके दिल से 'हमदर्दी' (Sympathy) पूरी तरह खत्म हो गई है। जब लोग अपने सगे-संबंधियों और पड़ोसियों की पीड़ा को नहीं समझते, तो वे मूक (गूँगे) पशु-पक्षियों के दर्द को भला क्या समझेंगे? आज का इंसान सिर्फ 'अपने सुख' से खुश होता है और दूसरे के दुःख पर आँखें मूँद लेता है।
= अर्थ: प्रकृति (Nature/Environment) बहुत विशाल और सहनशील है, लेकिन जब मनुष्य 'विकास' (Development) के नाम पर जंगलों को काटता है, नदियों को रोकता है और पहाड़ों को तोड़ता है, तो एक दिन 'प्रकृति का गुस्सा' (Nature's Wrath) फूट पड़ता है। भूकंप (Earthquakes), बाढ़ (Floods), भयंकर तूफान (Cyclones) और बीमारियाँ (जैसे बे-मौसम बारिश) इसी बात का परिणाम हैं कि इंसान ने प्रकृति की 'सहनशक्ति के बाँध' को तोड़ दिया है।
प्रश्न 1: 'अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले' पाठ के आधार पर बताइए कि आज की मानवीय (Human) सभ्यता और पुरानी सभ्यता में सबसे बड़ा 'अंतर' क्या है?
उत्तर: सबसे बड़ा अंतर इंसानी 'संवेदनशीलता' (Sensitivity) और 'स्वार्थ'
(Selfishness) का है।
1. पुरानी सभ्यता: प्राचीन काल में मनुष्य यह मानता था कि धरती केवल हमारी नहीं, बल्कि
पशु-पक्षियों और जानवरों की भी है। लोग (जैसे सुलेमान और शेख अयाज़) चींटियों तक के दर्द को अपना दर्द समझते
थे।
2. आज की सभ्यता: आज मनुष्य अत्यंत घमंडी हो गया है। उसने पर्यावरण का नाश कर दिया है।
पुरानी 'सयुंक्त (Joint) परिवारों' की जगह 'कबूतर के दड़बे' (Flat/Apartment) ने ले ली है। आज लोग जानवरों को
तो छोड़िए, अपने पड़ोसियों और बेसहारा इंसानों के दुःख को देखकर भी 'दुखी' नहीं होते।
प्रश्न 2: लेखक की माँ और लेखक की पत्नी में कबूतरों के प्रति क्या 'अंतर' (Difference) स्पष्ट होता है?
उत्तर:
लेखक की माँ: वे अत्यंत संवेदनशील (Sensitive) और दयालु (Compassionate) थीं। जब उनसे
अनजाने में कबूतर का एक अंडा टूट गया था, तो उन्होंने इस बात का गहरा शौक (दुःख/Guilt) मनाया और
'प्रायश्चित' (Penance) स्वरूप पूरे दिन कुछ नहीं खाया (रोज़ा रखा) और भगवान से माफ़ी माँगी।
लेखक की पत्नी: वे आधुनिक और 'व्यावहारिक' (Practical/Selfish) हैं। घर में कबूतर
'गंदगी' फैलाते हैं और चीज़ें तोड़ते हैं, यह देखकर उन्होंने कबूतरों से 'हमदर्दी' जताने के बजाय, रोशनदान पर
'जाली' (Net) लगवा दी और उन्हें हमेशा के लिए बेघर (Homeless) कर दिया। यह अंतर बताता है कि आज इंसान अपनी
सुविधा के लिए कितना নিষ্ঠুর (Cruel) हो गया है।
प्रश्न 3: प्रकृति (Nature) में आए 'असंतुलन' (Imbalance) का क्या परिणाम हुआ है? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: मनुष्य ने अपनी सुख-सुविधाओं (कंक्रीट के जंगल और बिल्डरों की
बस्तियों) के लिए प्रकृति के साथ भयानक खिलवाड़ (असंतुलन) किया है:
1. पर्यावरण का विनाश: जंगल कट गए, जिससे जानवर बेघर हो गए और बेचारे कबूतरों को
इंसानों के 'रोशनदान' में घर बनाना पड़ा।
2. प्रकोप (Disasters): जब प्रकृति की 'सहनशक्ति' की सीमा पार हो गई, तो भयंकर 'भूकंप'
(Earthquakes), 'बाढ़' (Floods), और बे-मौसम तूफान (Cyclones) आने लगे। बंबई (मुंबई) के समुद्र ने क्रोधित
होकर तीन बड़े जहाज़ों को उड़ा कर फेंक दिया था, जो इस बात का सबूत है कि प्रकृति के गुस्से से इंसान बच नहीं
सकता।