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आत्मत्राण (रवीन्द्रनाथ ठाकुर)

CBSE Class 10 Hindi (Course B) • Sparsh Part-2 • Poetry (Kavya Khand)

कवि: रवीन्द्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore)

'गुरुदेव' रवीन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) भारत के एक महान कवि, दार्शनिक और नोबेल पुरस्कार विजेता (साहित्य, 1913) थे। उन्होंने ही हमारा राष्ट्रगान (National Anthem) 'जन-गण-मन' लिखा है। टैगोर की रचनाओं में ईश्वर के प्रति गहरा विश्वास और मानवता का बहुत ज़बदरस्त संदेश रहता है। इस प्रसिद्ध कविता 'आत्मत्राण' (स्वयं की रक्षा / Self-protection from Fear) का मूल रूप 'बांग्ला' (Bengali) भाषा में था, जिसका हिंदी अनुवाद हजारी प्रसाद द्विवेदी ने किया है। यह एक अलग तरह की प्रार्थना है जहाँ कवि भगवान से 'दुःख दूर करने' की नहीं, बल्कि दुख से 'लड़ने की ताक़त' माँगते हैं।

कविता का मूल भाव (Theme/Core Message):

'आत्मत्राण' (आत्मा की रक्षा या संकट से बचाव) एक बहुत ही शक्तिशाली और प्रेरणादायक प्रार्थना (Prayer) है। इस कविता में कवि 'करुणामय' (दयालु) ईश्वर से अपने दुख या मुसीबतों को दूर करने (Solve करने) की प्रार्थना नहीं करता है। इसके बजाय, वह भगवान से प्रार्थना करता है कि "हे ईश्वर! मेरे जीवन में चाहे कितनी भी बड़ी मुसीबत, दुःख या धोखा आए, मुझे उससे 'डरना' नहीं सिखाना; बल्कि मुझे इतनी 'मानसिक और शारीरिक ताकत' (Strength) दो कि मैं खुद अपने दम पर (Self-reliance) उन दुखों और संकटों पर जीत (विजय) हासिल कर सकूँ और मेरा विश्वास कभी न डगमगाए।"

पद 1: संकटों से लड़ने का साहस (निर्भयता की प्रार्थना)

विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं—
केवल इतना हो (करुणामय)
कभी न विपदा में पाऊँ भय।
दुःख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही,
पर इतना होवे (करुणामय)
दुःख को मैं कर सकूँ सदा जय।

शब्दार्थ: विपदाओं = मुसीबतों/संकटों (Troubles/Disasters), करुणामय = दया करने वाले (ईश्वर), भय = डर (Fear), दुःख-ताप = दुखों की आग (Heat of sorrow), व्यथित = दुखी/परेशान (Distressed), चित्त = मन/हृदय, सांत्वना = तसल्ली (Consolation), जय = जीत (Victory)।

भावार्थ: कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ईश्वर (करुणामय) से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि:
"हे प्रभु! मैं यह प्रार्थना बिल्कुल नहीं कर रहा हूँ कि आप मुझे मेरी ज़िंदगी की मुसीबतों (विपदाओं) से बचा लें या मेरे संकट दूर कर दें। बल्कि मैं सिर्फ़ इतना माँगता हूँ कि जब भी मेरे जीवन में कोई गंभीर मुसीबत आए तो मैं कभी 'भयभीत' (डरूँ) ना होऊँ
हे ईश्वर! जब मैं दुखों की आग (ताप) में जल रहा होऊँ और मेरा 'मन' (चित्त) बहुत अधिक परेशान (व्यथित) हो, तब अगर आप मुझे आकर झूठी 'तसल्ली या सांत्वना' भी न दें, तो चलेगा (मुझे मंज़ूर है)
परन्तु, हे दयालु स्वामी! मुझमें केवल इतनी 'शक्ति' (Strength) और सहनशीलता भर दो कि मैं अपने स्वयं के बल (अपने दम) पर उस सबसे बड़े 'दुःख पर हमेशा जीत (जय) प्राप्त कर सकूँ'।"

पद 2: अपने बल (पौरुष) पर भरोसा

कोई कहीं सहायक न मिले,
तो अपना बल पौरुष न हिले;
हानि उठानी पड़े जगत् में लाभ अगर वंचना रही,
तो भी मन में ना मानूँ क्षय।

शब्दार्थ: सहायक = मदद करने वाला (Helper), बल पौरुष = अपनी हिम्मत/ताकत (Own courage and masculinity), जगत् = दुनियाँ, वंचना = धोखा/छलाव (Deceit/loss), क्षय = हार या विनाश (Loss/defeat)।

भावार्थ: कवि भगवान से आगे कहते हैं कि:
"हे ईश्वर! ज़िंदगी के रास्ते और मुश्किल भरे संघर्ष में (सुख-दुःख में) अगर दुनिया का 'कोई भी मनुष्य मेरी मदद (सहायता) करने के लिए आगे न आए', तो भी मेरे अंदर इतनी हिम्मत हो कि 'मेरी अपनी ताक़त, हिम्मत और पौरुष' (बल-पौरुष) कभी भी न हिले (यानी मैं कभी कमज़ोर न पड़ूँ)
इस दुनिया (जगत्) में अगर मुझे हमेशा अपने व्यापार या जीवन में 'हानि' (नुकसान/Loss) ही उठानी पड़े, और जो मुझे लाभ (Profit/Success) मिलना चाहिए था, वह सिर्फ 'एक धोखा' (वंचना) ही बनकर रह जाए, सारा जग मुझे धोखा दे दे;
तब भी मैं अपने मन में इस स्थिति को अपनी 'हार' (क्षय/विनाश) न मानूँ, बल्कि फिर से दुगने जोश (Courage) के साथ खड़ा होकर संघर्ष कर सकूँ।"

पद 3: मैं भी अपना बोझ (भार) स्वयं उठाऊँ

मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं—
बस इतना होवे (करुणामय)
तरने की हो शक्ति अनामय।
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही,
केवल इतना रखना अनुनय—
वहन कर सकूँ इसको निर्भय।

शब्दार्थ: त्राण = रक्षा/बचाव (Protection/Salvation), अनुदिन = हर दिन (Every day), तरने की = भवसागर/मुसीबतों से पार उतरने की (To endure/cross over), अनामय = रोग-रहित/स्वस्थ (Healthy/Disease-free), भार = बोझ/दुःख का बोझ (Burden), लघु = कम/छोटा (Reduce), अनुनय = विनती/निवेदन (Request), वहन = उठाना (Bear/carry), निर्भय = बिना डरे (Fearless)।

भावार्थ: कवि फिर से अपनी बात को दोहराते हुए कहते हैं कि:
"हे सर्वशक्तिमान ईश्वर! मेरी यह प्रार्थना भी नहीं है कि तुम 'हर दिन' (अनुदिन) खुद आकर मेरी रक्षा (त्राण) करो या मुझे बचाओ। बल्कि मेरी विनती सिर्फ़ इतनी है कि मेरा शरीर बिल्कुल स्वस्थ और रोग-मुक्त (अनामय) रहे ताकि मेरे अंदर 'मुसीबतों के भवसागर को पार करने (तरने)' की भरपूर शक्ति और ताक़त हमेशा बनी रहे।
हे प्रभु! मेरे जीवन में जो कष्टों और 'दुखों का भारी बोझ' (भार) है, अगर तुम उसे मेरे कन्धों से कम (लघु) नहीं करना चाहते और मुझे तसल्ली (सांत्वना) नहीं देते, तो कोई बात नहीं;
लेकिन, तुमसे मेरा एक यही 'छोटा-सा निवेदन' (अनुनय) है कि मुझे सिर्फ इतनी क्षमता (Capability) दो कि मैं इन सारे दुखों का बोझ अपने खुद के कन्धों पर 'बिना डरे' (निर्भय) होकर 'उठा (वहन कर)' सकूँ और ज़िंदगी व्यतीत कर सकूँ।"

पद 4: सुख और दुःख दोनों में ईश्वर पर विश्वास (The Core Philosophy)

नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
दुःख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही,
उस दिन ऐसा हो करुणामय,
तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय!

शब्दार्थ: नत शिर = सिर झुकाकर (With bowed head), तव = तुम्हारा (Your), छिन-छिन = हर पल/क्षण-क्षण (Every moment), दुःख-रात्रि = दुखों की काली रात (Dark night of sorrow), वंचना = धोखा (Cheating/Deceit), निखिल मही = पूरी दुनिया/संपूर्ण पृथ्वी (Whole world), संशय = शक/संदेह (Doubt)।

भावार्थ: कविता के अंतिम पद में कवि कहते हैं कि:
"हे ईश्वर! जब मेरी ज़िंदगी में 'सुख के चमकते हुए अच्छे दिन' (Happy days) आएँ, उस समय में भी मैं अहंकार (घमंड) न करूँ; बल्कि पूरे सम्मान के साथ 'अपना सिर तुम्हारे सामने झुकाकर (नत शिर होकर)' तुम्हारे मुख (चेहरे) को 'हर पल' (छिन-छिन) पहचानता रहूँ और तुम्हें याद करता रहूँ
इसके बाद सबसे बड़ी प्रार्थना यह है कि: जिस दिन मेरी ज़िंदगी में 'दुखों की सबसे भयानक अँधेरी रात' (दुःख-रात्रि) छा जाए और उस दिन पूरी की पूरी दुनिया (निखिल मही) मुझे 'धोखा' (वंचना) दे दे (अर्थात कोई भी मेरा साथ ना दे);
हे दयालु ईश्वर (करुणामय)! बस उस दिन भी मुझमें इतनी शक्ति और ऐसा दृढ़ विश्वास बनाए रखना कि 'अत्यधिक दुःख के समय में भी, मैं तुम्हारी (ईश्वर की) न्यायशीलता और तुम्हारी सत्ता पर कोई 'शक' या संदेह (संशय) न करूँ।'
(अर्थात, चाहे सुख हो या दुःख, मेरा विश्वास डगमगाए नहीं और मैं दुःख के लिए कभी भी 'भगवान को दोष' न दूँ)।

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: 'आत्मत्राण' शीर्षक का क्या अर्थ है? सामान्य प्रार्थनाओं और कवि (रवीन्द्रनाथ ठाकुर) की प्रार्थना में क्या मूल अंतर है?

उत्तर:
1. शीर्षक का अर्थ: 'आत्मत्राण' का शाब्दिक अर्थ है—'आत्मा (स्वयं/Self) की रक्षा (त्राण) करना' या 'संकट या डर से स्वयं का बचाव' (Self-protection from Fear)।
2. मूल अंतर: सामान्य इंसान अपनी 'प्रार्थनाओं' (Prayers) में ईश्वर से हाथ जोड़कर यह माँगता है कि भगवान उसके संकट दूर कर दें, उसे धन या सुख दें, उसे मुसीबतों (विपदाओं) से बचा लें और उसका काम सफल कर दें।
लेकिन, कवि (टैगोर) की प्रार्थना बिल्कुल अलग है। वे भगवान से कहते हैं कि "हे प्रभु! मेरे दुखों को दूर बिल्कुल भी मत करना, मुझे समस्याओं से मत बचाना। बस मुझे 'मुसीबतों से बिना डरे लड़ने की शक्ति और साहस' (कर्मण्यता) प्रदान करना।" वे आत्मनिर्भर (Self-reliant) बनना चाहते हैं।


प्रश्न 2: जिंदगी में आने वाली हानि (Loss) या धोखे (वंचना) के समय के लिए कवि ईश्वर से क्या माँगता है?

उत्तर: कवि (रवीन्द्रनाथ ठाकुर) प्रार्थना करते हैं कि जब इस व्यापारिक दुनिया (जगत्) में उन्हें हर तरफ से नुकसान (हानि) उठानी पड़े और जब उनके साथ केवल 'धोखा और छलावा' (वंचना) हो, तब भी:
1. उनके मन का अपनी मेहनत और अपनी 'ताकत' (बल-पौरुष) पर से भरोसा कभी न हिले
2. दुनिया के धोखे से उनके मन में 'हारने की भावना' (क्षय/विनाश) पैदा न हो, बल्कि वे और अधिक हिम्मत और साहस से अपने काम में जुटें।


प्रश्न 3: "मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही"—इस पंक्ति के माध्यम से कवि भगवान को क्या सन्देश देता है?

उत्तर: इस पंक्ति के माध्यम से कवि कहना चाहता है कि, "हे प्रभु! मेरे जीवन में दुखों और संघर्षों का जो भारी बोझ (भार) है, मैं आपसे (ईश्वर से) उसे कम (लघु) करने की प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ। अगर आप मुझे कोई तसल्ली (सांत्वना) भी न दें, तो कोई बात नहीं (मुझे मंज़ूर है)।"
कवि चाहते हैं कि वे अपनी मुसीबतों से घबराकर भागना नहीं चाहते, बल्कि वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि "उन्हें अपना दुःख जीवन भर 'निर्भय' होकर उठाने की (वहन करने की) ताक़त मिलनी चाहिए।"


प्रश्न 4: "दुःख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही... तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय!"—कवि ईश्वर से यह क्यों कहता है कि 'वह कभी ईश्वर पर संशय (शक) न करे'?

उत्तर: अक्सर ऐसा होता है कि जब किसी इंसान पर कोई बहुत गहरी मुसीबत (दुःख-रात्रि) आती है या सब कुछ बर्बाद हो जाता है, तो वह सबसे पहले 'भगवान' पर शक (संशय) करता है और भगवान को ही दोष देता है कि 'भगवान ने मेरे साथ ही ऐसा बुरा क्यों किया'।
परन्तु, कवि का ईश्वर के प्रति विश्वास इतना गहरा है कि वे प्रार्थना करते हैं:
"जब मेरी ज़िंदगी की सबसे भयानक या दुखों की रात (दुःख-रात्रि) हो, जिस समय यह 'पूरी धरती और दुनिया' (निखिल मही) मुझे धोखा (वंचना) दे दे (अर्थात मेरा कोई साथ न दे);
हे ईश्वर! उस दिन भी मेरा विश्वास मत टूटने देना, और मेरे मन में तुम्हारे न्याय और तुम्हारी सत्ता पर 'रत्ती-भर भी शक या संदेह' (संशय) पैदा न हो। मेरा विश्वास (Faith) हमेशा अटूट रहे।"