ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Stories) • Chapter 7
पाठ का परिचय (Introduction):
'संदेह' जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित एक मनोवैज्ञानिक और मार्मिक कहानी है। यह कहानी मानव मन की उस जटिल भावना 'संदेह' (Doubt) पर आधारित है, जो एक बार मन में घर कर जाए तो सबसे पवित्र रिश्तों को भी कलंकित कर देती है। कहानी मुख्य रूप से एक दुखी और अनाथ विधवा, श्यामा, और एक युवक, रामनिहाल, के बीच उलझे हुए मनोवैज्ञानिक तारों को दर्शाती है, जहाँ रामनिहाल पालता है कि श्यामा उससे प्रेम करती है।
रामनिहाल एक अस्थिर प्रवृत्ति का युवक है जो श्यामा (एक कम उम्र की विधवा) के घर में किराएदार के रूप में रहता है। श्यामा एक गंभीर और मर्यादित स्त्री है, जिस पर उसके परिवार ने कई जुल्म किए थे (विशेषकर उसके पति के निधन के बाद)। रामनिहाल श्यामा के प्रति सहानुभूति रखता है और उसकी हर छोटी-बड़ी मदद करता रहता है।
एक दिन रामनिहाल ने अचानक श्यामा का घर (और शहर) छोड़कर हमेशा के लिए दूर जाने का निर्णय लिया। जब वह अपना सामान बाँध रहा था, तब श्यामा ने इसका कारण पूछा और उसे रोकने का प्रयास किया। श्यामा का यह सरल और आत्मीय प्रयास रामनिहाल के मन के 'संदेह' (भ्रम) को और गहरा कर देता है।
रामनिहाल ने श्यामा को बताया कि उसे श्यामा के दुःख और अकेलेपन की चिंता होती है। रामनिहाल के मन में कई महीनों से यह 'संदेह' (Galatfehmi) पल रहा था कि श्यामा उससे प्रेम करती है और वह उसके (रामनिहाल के) बिना नहीं रह पाएगी। वह यह मानता था कि श्यामा अपनी मर्यादा के कारण अपने होठों से प्रेम का इज़हार नहीं कर पा रही है, लेकिन उसकी आँखें और उसके व्यवहार यही गवाही देते हैं।
जब रामनिहाल ने श्यामा के सामने अपने मन का यह भ्रम (संदेह) प्रकट किया, तो श्यामा सन्न रह गई। उसे दुःख भी हुआ और आश्चर्य भी। श्यामा ने बहुत गंभीरता और स्पष्टता से रामनिहाल को समझाया कि वह उसके प्रति कोई ऐसी भावना नहीं रखती। श्यामा ने कहा कि वह रामनिहाल को केवल एक हितैषी, शुभचिंतक और भाई के रूप में देखती है जिसने उसके दुख के समय में उसकी मदद की।
श्यामा ने आगे कहा कि उसका जीवन उसके मृत पति की स्मृतियों (यादों) के सहारे ही कट रहा है, और वह किसी दूसरे पुरुष के बारे में सोच भी नहीं सकती। श्यामा के इन निष्कपट और स्पष्ट शब्दों ने रामनिहाल की आँखें खोल दीं।
रामनिहाल को अपनी भूल (अपने झूठे संदेह) का गहरा अहसास हुआ। उसे यह समझ में आ गया कि स्त्री की सीधी-सादी आत्मीयता को उसने गलत समझकर प्रेम मान लिया था। उसका 'संदेह' टूट गया। श्यामा ने उसे सलाह दी कि उसे इस तरह भागने की आवश्यकता नहीं है; वह वहीं रहकर अपनी स्थिर ज़िंदगी गुज़ारे। कहानी के अंत में, रामनिहाल के मन का यह 'संदेह' धुल जाता है और वह वास्तविकता का सामना करता है।
प्रसंग: श्यामा ने यह वाक्य तब कहा जब रामनिहाल अचानक घर छोड़कर दूर जाने की तैयारी कर रहा था।
व्याख्या: यह पंक्ति श्यामा की आत्मीयता और एक शुभचिंतक (रामनिहाल) के जाने का दुःख प्रकट करती है। लेकिन रामनिहाल अपने मन के 'संदेह' के कारण इन वाक्यों को श्यामा के प्रेम (Love) का इज़हार मान बैठता है, जो कि उसकी सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक भूल थी।
प्रसंग: जब रामनिहाल ने यह इज़हार किया कि वह जानता है कि श्यामा उससे प्रेम करती है, तो श्यामा ने यह कड़ा और स्पष्ट जवाब दिया।
व्याख्या: यह कहानी का क्लाइमेक्स (Climax) है जहाँ 'संदेह' की दीवार टूटती है। श्यामा अत्यंत स्पष्ट शब्दों में रामनिहाल के पाले गए भ्रम को तोड़ देती है कि उसके मन में ऐसी कोई भावना कभी थी ही नहीं। वह रामनिहाल को केवल अपना हमदर्द और भाई मानती थी।
प्रश्न 1: रामनिहाल को श्यामा के बारे में क्या 'संदेह' (भ्रम) हो गया था?
उत्तर: रामनिहाल श्यामा के घर किराए पर रहता था और श्यामा के दुखों में उसकी सहायता करता था। श्यामा भी उसके प्रति आत्मीयता और चिंता दिखाती थी। रामनिहाल एक भावुक मनुष्य था। उसने श्यामा की इस साधारण आत्मीयता और कृतज्ञता (Gratitude) को गलत समझ लिया। उसके मन में यह गहरा 'संदेह' (भ्रम) घर कर गया था कि श्यामा (जो एक विधवा है) उससे मन ही मन बहुत प्रेम करती है और अपनी सामाजिक मर्यादा के कारण खुलकर कह नहीं पा रही है।
प्रश्न 2: रामनिहाल के जाने की बात सुनकर श्यामा ने उसे क्यों रोका?
उत्तर: श्यामा एक कम उम्र की विधवा थी जिसके जीवन में दुखों और संघर्षों का पहाड़ था। रामनिहाल ही उसका एकमात्र शुभचिंतक और हितैषी था जो बिना किसी स्वार्थ के उसके घर और जीवन से जुड़ी समस्याओं में उसकी मदद करता था। श्यामा उसे अपना सच्चा हमदर्द और भाई मानती थी। जब रामनिहाल ने अचानक बिना किसी कारण के घर और शहर छोड़ने का निर्णय लिया, तो श्यामा को अपने इस एकमात्र सहायक को खोने का दुख हुआ, इसलिए उसने आत्मीयतावश उसे रोका।
प्रश्न 3: कहानी के अंत में रामनिहाल का संदेह कैसे दूर हुआ?
उत्तर: जब रामनिहाल ने खुद को रोक न पाते हुए श्यामा को बता दिया कि वह उसके (श्यामा के) प्रेम के कारण ही अपना सामान बाँधकर दूर जा रहा है, ताकि श्यामा को दुख न हो; तो श्यामा सन्न रह गई। श्यामा ने अत्यंत दृढ़ता और स्पष्टता से रामनिहाल को समझाया कि वह भारी भ्रम और संदेह में जी रहा है। उसने रामनिहाल को कभी उस नज़र (प्रेम की दृष्टि) से नहीं देखा था; वह तो केवल उसके मृत पति की यादों के सहारे जी रही है। श्यामा के इन स्पष्ट शब्दों से रामनिहाल का 'संदेह' पूरी तरह टूट गया और उसे अपनी भूल का अहसास हुआ।