उत्तर
गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में यह व्यंग्य निहित है कि उद्धव वास्तव में भाग्यवान न होकर अति भाग्यहीन हैं। वे श्रीकृष्ण जैसे प्रेम और सौंदर्य के सागर के सान्निध्य में रहते हुए भी उनके प्रेम से पूरी तरह अछूते हैं। जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहकर भी जल की बूँद से प्रभावित नहीं होता, उसी प्रकार उद्धव कृष्ण के पास रहकर भी उनके प्रेम के बंधन में नहीं बंध पाए। गोपियों के अनुसार, जिसने कभी प्रेम का स्वाद नहीं चखा, वह सबसे बड़ा अभागा है।
उत्तर
गोपियों ने उद्धव के व्यवहार की तुलना निम्नलिखित उदाहरणों से की है:
1. कमल के पत्ते से: जो जल में रहते हुए भी जल से प्रभावित नहीं होता।
2. तेल की गगरी (मटकी) से: जिसे जल में डुबाने पर भी उस पर पानी की एक बूँद नहीं ठहर पाती。
उद्धव भी कृष्ण के समीप रहकर उनके प्रेम रूपी जल से सर्वथा मुक्त (अछूते) रहे हैं।
उत्तर
मरजादा न लही के माध्यम से प्रेम की मर्यादा न रहने की बात की जा रही है। प्रेम की मर्यादा यह है कि प्रेमी और प्रेमिका दोनों प्रेम को निभाएँ। गोपियों ने तो कृष्ण से सच्चा प्रेम किया, लेकिन कृष्ण ने मथुरा जाकर उन्हें दर्शन देने के बजाय उद्धव के माध्यम से योग-संदेश भेज दिया। गोपियों के अनुसार, कृष्ण ने उनके सच्चे प्रेम का उत्तर योग संदेश से देकर प्रेम की मर्यादा का उल्लंघन किया है।
उत्तर
गोपियों के वाक्चातुर्य (बोलने की चतुराई) की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. सटीक व्यंग्य: वे उद्धव को भाग्यवान कहकर अत्यंत तीखा व्यंग्य करती हैं कि उनसे बड़ा अभागा कोई नहीं है。
2. स्पष्टवादिता: गोपियाँ बिना किसी डर या संकोच के उद्धव के योग-संदेश को कड़वी ककड़ी के समान त्याज्य बता देती हैं。
3. तर्कशीलता: वे कमल के पत्ते और तेल की गगरी का सटीक तर्क देकर उद्धव को निरुत्तर कर देती हैं।
उत्तर
गोपियों ने उद्धव को निम्नलिखित उलाहने दिए हैं:
1. उन्होंने उद्धव के योग-संदेश को कड़वी ककड़ी के समान बताया है जिसे निगला नहीं जा सकता。
2. योग-संदेश को ऐसी व्याधि (बीमारी) कहा है जिसे उन्होंने न कभी देखा, न सुना और न ही भोगा है。
3. वे उद्धव को राजनीतिज्ञ कहती हैं, जो उनके अनुसार, कृष्ण से राजनीति पढ़ आए हैं और अब चतुराई भरी बातें कर रहे हैं।